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    Home » घर में अमंगल का कारण बनता है श्राद्ध न करना
    धर्म

    घर में अमंगल का कारण बनता है श्राद्ध न करना

    Dainik Uttarakhand NewsBy Dainik Uttarakhand NewsSeptember 7, 2025Updated:August 27, 2026No Comments
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    श्राद्ध पक्ष पर विशेष

    तर्पण देने से तृप्त होते हैं पितृ

    निशीथ सकलानी

    ॐ सर्वेभ्यो पितृभ्यो नमः
    आज से आरंभ हो रहे पितृ पक्ष का समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित करने का पावन अवसर है। इस अवसर पर तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है, बल्कि जीवन में सुख, संतोष और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है।

    पितृ पक्ष, पूर्वजों के सम्मान हेतु 16 दिनों का काल, 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर, 2025 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। इस दौरान, हिंदू पितृ ऋण से मुक्ति पाने और दिवंगत आत्माओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं। पवित्र हिंदू धर्म के अनुसार, पितृ पक्ष की शुरुआत में, सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। ऐसा माना जाता है कि इसी क्षण के साथ, आत्माएँ पितृलोक छोड़कर अपने वंशजों के घरों में एक महीने तक निवास करती हैं, जब तक कि सूर्य अगली राशि तुला में प्रवेश नहीं कर जाता और पूर्णिमा नहीं आ जाती। अर्यमा पितरों के देवता माने जाते हैं। मान्यताओं के मुताबिक, अर्यमा महर्षि कश्यप और देवमाता अदिति के पुत्र हैं। पितृ पक्ष में अयर्मा देव की पूजा का विधान है।

    भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, “आत्मा का न तो कभी जन्म होता है और न ही मृत्यु। आत्मा अजन्मा, शाश्वत, नित्य और आदि है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।” पितृ पक्ष के अनुष्ठान आत्मा को जीवन-मरण के दुष्चक्र से मुक्त करते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    इस बार के श्राद्ध पक्ष में आज 7 सितबर को चंद्र ग्रहण जबकि 22 सितंबर को सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। धर्मशास्त्रों के अनुसार ग्रहण की समाप्ति के बाद किया गया दान कई गुना फलदायी होता है। विद्वानों का कहना है कि ग्रहण के इस दुर्लभ संयोग में श्रद्धा से किया गया तर्पण एवं दान पीढ़ियों का कल्याण करता है।

    पित्र पक्ष के संदर्भ में मार्कण्डेय पुराण में ‘‘रौच्य ऋषि के जन्म’’ की कथा है। इस कथा के अनुसार मार्कण्डेय पुराण में श्राद्ध के विषय में बताया गया है कि यह पूर्वजों की तृप्ति का एक महत्वपूर्ण कर्म है। यह कर्म विभिन्न योनियों में भटकते पितरों को तृप्त करता है, जैसे स्नान के जल से देवभाव वाले पितर, पिण्ड के अन्न कणों से पशु-पक्षी योनि वाले पितर, और अन्यायोपार्जित धन से श्राद्ध करने पर चांडाल आदि योनियों वाले पितर तृप्त होते हैं। यह कृत्य पितरों को सुख और शांति प्रदान करता है। मार्कण्डेयपुराण में यह भी उल्लेख है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, निरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है।

    पितृपक्ष के दौरान हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों जैसे चीन, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कम्बोडिया, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे कई एशियाई देशों में बौद्ध और टोइस्टि धर्म से जुड़ी परंपराओं के तहत पितरों को सम्मान दिया जाता है। इन देशों में भी पितरों की आत्मा की शांति के लिए त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनमें लालटेन जलाना और विशेष पूजा करना शामिल है।

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